Monday, October 15, 2018

'पाकिस्तान को ज़बान नहीं डंडे का ज़ोर दिखाए भारत'

मार्च 1956 को लागू होने वाले जिस संविधान को मिर्ज़ा साहब ने कूड़ा क़रार दिया था वो संविधान पाकिस्तान की संसद ने उन्हीं के नेतृत्व में तैयार किया था. इस संविधान के तहत पाकिस्तान ग्रेट ब्रिटेन की डोमिनियन से निकल कर एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश की हैसियत से उभरा था और इसी संविधान ने पाकिस्तान को इस्लामी लोकतंत्र घोषित किया था.
लेकिन एक अड़चन ये थी कि इसी संविधान के तहत राष्ट्रपति के पद को प्रधानमंत्री के पद से बेहतर क़रार दिया गया था और इस में 58 (2 बी) क़िस्म की कुछ ऐसी बातें डाली गई थीं कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को किसी भी वक़्त बस यूं ही निकाल बाहर कर सकते थे.
इसकंदर मिर्ज़ा ने शक़ की तलवार का वो इस्तेमाल किया कि उसके मुक़ाबले में 58 (2बी) कुंद छुरी दिखाई देती है.
उन्होंने जिन प्रधानमंत्रियों का शिकार किया ज़रा उनकी फ़ेहरिस्त देखें-
मोहम्मद अली बोगराः 17 अप्रैल से 12 अगस्त 1955. उनका इस्तीफ़ा संविधान लागू होने से पहले लिया गया था.
चौधरी मोहम्मद अलीः 12 अगस्त 1955 से 12 सितंबर 1956
हुसैन शहीद सोहरावर्दीः 12 अक्तूबर 1956 से 17 सितंबर 11957
इब्राहिम इस्माइल चुंद्रीगरः 17 अक्तूबर 1957 से 16 दिसंबर 1957
फ़िरोज़ ख़ान नूनः 16 दिसंबर 1957 से 7 अक्तूबर 1958
पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों की इस म्यूज़िकल चेयर के बारे में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से जुड़ा ये क़िस्सा दोहराया जाता है कि 'मैं तो इतनी जल्दी धोतियां भी नहीं बदलता जितनी जल्दी पाकिस्तान अपने प्रधानमंत्री बदल लेता है.'
इसकंदर मिर्ज़ा की 'महलाती साज़िशों' की एक झलक एक बार फिर शहाबनामा के पन्नों से देखें,
'इसकंदर मिर्ज़ा को गवर्नर जनरल बने हुए तीन माह हुए थे कि शाम के पांच बजे मुझे घर पर मिस्टर सोहरावर्दी ने टेलीफ़ोन करके पूछा, प्रधानमंत्री के तौर पर मेरी शपथ के लिए कौन-सा दिन तय हुआ है?'
'ये सवाल सुनकर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. यही बात मैंने उन्हें बताई तो मिस्टर सोहरावर्दी ग़ुस्से से बोले, तुम किस तरह के निकम्मे सेक्रेट्री हो? फ़ैसला हो चुका है, अब सिर्फ़ विस्तृत विवरण का इंतज़ार है. फ़ौरन गवर्नर जनरल के पास जाओ और शपथ लेने की तारीख़ और समय पता करके मुझे ख़बर दो, मैं इंतज़ार करूंगा.'
'मजबूरन मैं इसकंदर मिर्ज़ा साहब के पास गया. वो अपने चंद दोस्तों के साथ ब्रिज खेल रहे थे. मौका पाकर मैं उन्हें कमरे से बाहर ले गया और उन्हें मिस्टर सोहरावर्दी वाली बात बताई. ये सुन कर वो ख़ूब हंसे और अंदर जाकर अपने दोस्तों से बोले, तुमने कुछ सुना? सोहरावर्दी प्रधानमंत्री की शपथ लेने का वक़्त पूछ रहा है.'
'इस पर सबने ताश के पत्ते ज़ोर-ज़ोर से मेज़ पर मारे और बड़े ऊंचे फ़रमाइशी क़हक़हे बुलंद किए. कुछ देर अच्छी ख़ासी हुड़दंग जारी रही. इसके बाद गवर्नर जनरल ने मुझे कहा, 'मेरी तरफ़ से तुम्हें इजाज़त है कि तुम सोहरावर्दी को बता दो कि शपथग्रहण का वक़्त परसों के लिए तय हुआ है और चौधरी मोहम्मद अली प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे.'
'वहां से मैं सीधा मिस्टर सोहरावर्दी के यहां पहुंचा और उनको ख़बर सुनाई. ऐसा दिखाई देता था कि उनके साथ कुछ वादे हो चुके थे. उस नए सूरत-ए-हाल पर वो बहुत झल्लाए और मेरे सामने उन्होंने बस इतना कहा- अच्छा फिर वही पड़ोस की साज़िश.'
लेकिन जैसा कि होता आया है, देश के राष्ट्रपति की 'पड़ोस की साज़िशें' ख़ुद उन्हीं पर भारी पड़ गईं. इसकंदर मिर्ज़ा ने न सिर्फ़ सिफ़ारिश करके जूनियर अफ़सर अयूब ख़ान को आर्मी चीफ़ बनवाया था बल्कि मार्शल लॉ से सिर्फ़ तीन महीने पहले उनके कार्यकाल को दो साल के लिए और बढ़ा दिया था.
उन्हीं अयूब ख़ान ने मार्शल लॉ के बीस दिन के अंदर-अंदर इसकंदर मिर्ज़ा को जहाज़ में लदवाकर, अंतरिक्ष में तो नहीं, पहले क्वेटा और फिर ब्रितानिया भेज दिया.
आपने देखा होगा कि ये स्क्रिप्ट भी पाकिस्तान में इतनी चली है कि घिस-पिट गई है. जो जिस आर्मी चीफ़ को लगाता है वही उसके क़दमों तले से क़ालीन खींच लेता है.
पाकिस्तान बनने के बाद लियाक़त अली ख़ान ने उन्हें देश का रक्षामंत्री बनाया. गवर्नर जनरल ग़ुलाम मोहम्मद ने ख़राब सेहत की वजह से इस्तीफ़ा दे दिया तो इसकंदर मिर्ज़ा उनकी जगह गवर्नर जनरल बन गए. इसके बाद जो कुछ भी हुआ वो पाकिस्तान के इतिहास का हिस्सा है.
इतिहास का हिस्सा ये भी है कि सात अक्तूबर को मार्शल लॉ लगाने के बाद इसकंदर मिर्ज़ा को जल्द ही एहसास हो गया कि संविधान को रद्द करके और संसद भंग करके उन्होंने वही डाल काट डाली है जिस पर वो बैठे थे.
इसकंदर मिर्ज़ा के सात अक्तूबर और 27 अक्तूबर के बीच के बीस दिन बड़े व्यस्त गुज़रे. इस दौरान पहले तो उन्होंने सेना के भीतर अय्यूब ख़ान के विरोधी धड़े को शह देकर पहले तो अय्यूब ख़ान का पत्ता साफ़ करने की कोशिश की. जब उसमें नाकामी हुई तो 24 अक्तूबर को अयूब ख़ान को चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर के पद से हटा कर प्रधानमंत्री बना डाला.किन अयूब ख़ान को बराबर इसकंदर मिर्ज़ा की 'महलाती साज़िशों' की ख़बर मिलती रही. वो 'फ्रेंड्ज़ नॉट मास्टर्ज़' में लिखते हैं,
'हमें सूचना मिली कि उनकी बीवी (बेग़म नाहीद मिर्ज़ा) उनसे हर वक़्त लड़ती झगड़ती रहती हैं कि जब तुमने एक ग़लती कर ही दी है तो अब अयूब ख़ान का भी सफ़ाया कर दो.'
'मैं उनके पास गया और कहा, आप चाहती क्या हैं? सुना है आप फ़ौजी अफ़सर की गिरफ़्तारी का हुक़्म देती फिर रही हैं?'
उन्होंने कहा, आपको ग़लत ख़बर मिली है.
'मैंने कहा, देखिए ये अय्यारी और चालबाज़ी ख़त्म कीजिए. होशियार रहें, आप आग से खेल रहे हैं. हम सब आपकी वफ़ादारी का दम भरते हैं, फिर आप ऐसी शरारत क्यों कर रहे हैं?'
अयूब ख़ान ने भी भांप लिया था कि अगर संविधान ही नहीं है तो फिर राष्ट्रपति के पद का क्या मतलब है? संविधान की डाल ही नहीं रही तो उस पर राष्ट्रपति पद का घौंसला कैसे रहेगा?
27 अक्तूबर की रात जनरल बर्की, जनरल आज़म और जनरल ख़ालिद शेख़ इसकंदर मिर्ज़ा के घर पहुंच गए. नौकरों ने कहा कि साहब इस समय आराम कर रहे हैं, लेकिन जनरल इतनी आसानी से कहां टलते हैं. उन्होंने गाउन में ही राष्ट्रपति से पहले टाइप किए गए इस्तीफ़े पर दस्तख़त लिए और कहा कि अपना सामान उठा लें, आपको अभी इसी वक़्त राष्ट्रपति निवास से निकलना होगा.
इसकंदर मिर्ज़ा ने अपने ओहदे के बारे में कुछ बहस करने की कोशिश की, लेकिन बेग़म नाहीद एक फिर ज़्यादा समझदार साबित हुईं और उन्होंने सिर्फ़ इतना पूछा, मगर मेरी बिल्लियों का क्या होगा?
इनकी तारीफ़ में सबसे पहले जो बात कही जाती है वो ये है कि इसकंदर मिर्ज़ा मीर जाफ़र के पड़पोते हैं. वही मीर जाफ़र जिन्होंने 1757 में प्लासी की लड़ाई में बंगाल के हुक्मरान सिराजुद्दोला की अंग्रेज़ों के हाथों हार में अहम किरदार अदा किया था और जिनके बारे में अल्लामा इक़बाल कह गए थे-
'जफ़र अज़ बंगाल ओ सादिक़ अज़ दकन
नंग आदम, नंग दी, नंग वतन'
इन्हीं इसकंदर मिर्ज़ा के बेटे हुमायूं मिर्ज़ा ने एक किताब लिखी है, 'फ्रॉम प्लासी टू पाकिस्तान' जिसमें उन्होंने हैरतअंगेज़ तौर पर कुछ और ही कहानी बयान की है.
किताब के लेखक ने सिराजुद्दोला को बदमिज़ाज और बेरहम ठहराते हुए लॉर्ड क्लाइव के हाथों हार का ज़िम्मेदार ख़ुद उन्हें ही क़रार दिया तो दूसरी तरफ़ ये अजीबोग़रीब बात भी ढूंढी कि जिन लोगों ने सिराजुद्दोला को तख़्त पर बिठाया था (उनका मतलब अपने बुज़ुर्ग मीर जाफ़र से है) उन्हीं के साथ इस नौजवान हुक्मरान ने बेवफ़ाई की.
वो आगे चल कर लिखते हैं कि उस लड़ाई से तकरीबन ठीक 200 साल बाद बंगाल का इतिहास कराची में दोहराया गया और मीर जाफ़र के पड़पोते इसकंदर मिर्ज़ा ने जिस अय्यूब ख़ान को परवान चढ़ाया था, उसी ने अपने मोहसिन के सिर से ताज-ए-सदारत नोच लिया.
इसकंदर मिर्ज़ा भारतीय उपमहाद्वीप के ऐसे पहले सैन्य अफ़सर थे जिन्होंने ब्रितानिया के इंपीरियल मिलिट्री कॉलेज से प्रशिक्षण लिया था. लेकिन देश लौटने के बाद उन्होंने सिविल लाइन को तरजीह दी और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रांत में पॉलिटकल अफ़सर भर्ती हो गए.

Monday, October 8, 2018

COP21之后:如何助力巴黎协议?

当195个国家在去年底巴黎COP21会议上签署一项新的国际气候协议时,全球为之欢欣雀跃。该协议是一个关键的转折点,是世界走向零碳和气候适应的基本支点。但要延续巴黎峰会的势头、保证协议快速生效并得到充分执行,我们仍需采取一些关键的步骤。

本文中,我们就各国为保证巴黎协议执行而必须采取的重要措施有关问题进行回答

1)各国在COP21峰会上达成了巴黎协议,是否意味着协议已经生效?

并非如此,各国仍需采取相应的措施,协议才会生效。
2015年12月12日在 峰会上,联合国气候变化框架公约( )各缔约国只是“通过”了巴黎协议。如此一来,协议的形式和内容得到了正式的确立。

除了通过巴黎协议之外,各缔约国就协议生效的必要条件做出数项关键决定。各方就各国如何敲定其国家气候方案以及如何将国家自主贡献预案( )变为国家确定贡献( 协议正式生效后,将举行巴黎协议缔约国首次会议。在这次重要的会议上将通过许多保证协议有效所必需的详细规则和流程。

3)各国批准协议的时间表如何?

所有国家元首均可在2016年4月22日纽约举行的一场高级别签约仪式上签署协议。在接下来直至2017年4月21日的一年时间里,协议将开放签字。考虑到巴黎协议的重要性以及COP21峰会创造出的政治势头,专业人士预计许多国家都将派代表参加此次高层签约仪式。

虽然在协议上签字表明签约国承诺不会做出可能危害协议目标达成的行动,但签字本身并不意味着一国已经成为了巴黎协议的“缔约方”。如同许多其他国际协议一样,加入巴黎协议是一个两步走的过程:各国必须签署协议,然后还要表明其愿意加入协议并作为协议缔约方受到协议的约束。
)达成了一致。

2)现在该做什么?

广义上讲,各国现在必须加入巴黎协议并成为缔约国。要做到这一点,每个国家都应该签署条约并明确表示他们同意受到协议约束。
只有至少55个UNFCCC缔约国签署巴黎协议并表明愿意接受协议约束,且签约国的温室气体排放量总和在全球温室气体排放总量中所占比重达到55%以上时,协议才能“发生效力”,即生效并具有法律约束力。

Monday, October 1, 2018

चीन की ऐसी 'जेल' जहां बंद हैं दस लाख मुसलमान?

इन दिनों देश के पश्चिमी प्रांत शिनजिंयाग में अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति अपने रवैये की वजह से चीन की भारी आलोचना हो रही है. आलोचकों का कहना है कि चीन ने इस राज्य में बड़ी संख्या में मुसलमानों को ख़ास तरह के कैंपों में रखा है.
अगस्त में एक संयुक्त राष्ट्र की कमेटी को बताया गया था कि शिनजियांग में क़रीब दस लाख मुसलमानों को एक तरह की हिरासत में रखा गया है, जहां उन्हें 'दोबारा शिक्षा' दी जा रही है.
चीन इन ख़बरों का खंडन करता है. लेकिन इस दौरान शिनजियांग में लोगों पर निगरानी के कई सबूत सामने आए हैं.
आइए समझते हैं कि इस कहानी के अलग-अलग पहलू क्या हैं.
चीन के पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में रहने वाले एक करोड़ से अधिक वीगर समुदाय के अधिकतर लोग मुसलमान हैं. ये लोग ख़ुद को सांस्कृतिक नज़र से मध्य एशिया के देशों के क़रीब मानते हैं. उनकी भाषा भी तुर्की से मिलती-जुलती है.
लेकिन हाल के वर्षों में भारी संख्या में चीन के बहुसंख्यक नस्लीय समूह 'हान' चीनियों का शिनजियांग में बसना एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है. वीगर लोगों को लगता है कि अब उनकी रोज़ी-रोटी और संस्कृति ख़तरे में पड़ रही है.
शिनजियांग चीन के पश्चिम में देश का सबसे बड़ा प्रांत है. इसकी सीमाएं भारत, अफ़ग़ानिस्तान और मंगोलिया जैसे कई देशों से मिलती हैं. कहने को तो ये भी तिब्बत की ही तरह एक स्वायत्त क्षेत्र है लेकिन दरअसल यहां की सरकार की डोर बीजिंग के ही हाथ में है.
सदियों से इस प्रांत की अर्थव्यवस्था खेती और व्यापार पर केंद्रित रही है. ऐतिहासिक सिल्क रूट की वजह से यहां ख़ुशहाली रही है.
बीसवीं सदी की शुरुआत में वीगर समुदाय ने थोड़े वक्त के लिए ही सही, शिनजियांग को आज़ाद घोषित कर दिया था. लेकिन 1949 की कम्यूनिस्ट क्रांति के बाद ये प्रांत चीन का हिस्सा बन गया.
अगस्त 2018 में संयुक्त राष्ट्र की एक मानवाधिकार कमेटी को बताया गया था कि 'पूरा वीगर स्वायत्त क्षेत्र नज़रबंदी में है.'
इस कमेटी को बताया गया था कि क़रीब 10 लाख लोग हिरासती ज़िंदगी बिता रहे हैं. ऐसी रिपोर्टों की पुष्टि ह्यूमन राइट्स वॉच भी करता है.
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि एक तरह के हिरासती कैंपों में रखे गए लोगों को चीनी भाषा सिखाई जाती हैं और उन्हें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के प्रति वफ़ादारी की कसम खानी होती है.
साथ ही लोगों से उनके धर्म और संस्कृति की आलोचना करने को कहा जाता है.
ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक वीगर समुदाय को बेहद सख़्त निगरानी का सामना करना पड़ता है. लोगों के घरों के दरवाज़े पर QR कोड्स लगे हुए हैं और चेहरे को पहचानने के लिए कैमरे फ़िट हैं. अधिकारी जब चाहें तब ये पता लगा सकते हैं कि घर अंदर कौन है.
शिनजियांग से सीधी ख़बरें आना बहुत मुश्किल है. वहां मीडिया पर पाबंदी है. लेकिन बीबीसी ने कई बार इस क्षेत्र से रिपोर्ट्स जुटाई हैं और ख़ुद इन कैंपों के सबूत देखे हैं.
बीबीसी के कार्यक्रम न्यूज़नाइट ने कई ऐसे लोगों से भी बात की है जो इन जेलों में रह चुके हैं. ऐसे ही एक शख़्स हैं आमिर.
आमिर ने बीबीसी को बताया - ''वो मुझे सोने नहीं देते थे. मुझे कई घंटों तक लटका कर रखा जाता था. मेरी चमड़ी में सूइयां चुभाई जाती थीं. प्लास से मेरे नाख़ून नोचे जाते थे. टॉर्चर का सारा सामान मेरे सामने टेबल पर रखा जाता था ताकि में ख़ौफ़ज़दा रहूं. मुझे दूसरे लोगों के चीखने की आवाज़ सुनाई देती थी.''
अज़ात नाम के अन्य पूर्व क़ैदी ने बताया - '' जहां मैं क़ैद था, वहां डिनर के वक़्त करीब 1,200 लोग हाथों में प्लास्टिक की कटोरियां लेकर चीन समर्थक गीत गाते थे. वो सब रोबोट की तरह दिखते थे. उनकी तो आत्मा ही मर गई थी. मैं उनमें से कई लोगों को जानता हूं. वो सब ऐसे व्यवहार करते थे कि जैसे कि कार दुर्घटना में अपनी यादाश्त खो चुके हों.''
चीन का कहना है कि उसे अलगाववादी इस्लामी गुटों से ख़तरा है क्योंकि कुछ वीगर लोगों ने इस्लामिक स्टेट समूह के साथ हथियार उठा लिए हैं.
साल 2009 में शिनजियांग की राजधानी ऊरूमची में हुए दंगों में हान समुदाय के 200 लोग मारे गए थे. उसके बाद से यहां हिंसा बढ़ी है. जुलाई 2014 में पुलिस स्टेशन और सरकारी दफ़्तरों पर हुए हमलों में 96 लोग मारे गए थे.
अक्तूबर 2013 में बीजिंग के तियाननमेन स्क्वायर में एक कार भीड़ में घुसी और कई लोगों के कुचल दिया. चीनी प्रशासन ने इसके लिए भी शिनजियांग के अलगाववादियों को ज़िम्मेदार बताया गया था.
सरकार की ताज़ा कार्रवाई के पीछे फ़रवरी 2017 में शिनजियांग के ऊरूमची में हुई छुरेबाज़ी की घटनाएं हैं.
चीन का कहना है कि शिनजियांग में 'हिंसक आतंकवादी गतिविधियों' से निपट रहा है.
जिनेवा में एक संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में चीनी अधिकारी हू लियानहे ने कहा था कि दस लाख लोगों को हिरासत में रखे जाने की बात 'कोरा झूठ' है.
हाल ही में चीन के मानवाधिकार विभाग के एक अधिकारी ने कहा है, "आप कह सकते हैं कि ये तरीका सबसे उपयुक्त नहीं है लेकिन धार्मिक चरमपंथ से निपटने के लिए ऐसा किया जाना ज़रूरी है. क्योंकि पश्चिम के देश इस्लामी चरमपंथ से लड़ने में असफल हो गए हैं. बेल्जियम और पेरिस में हुए हमले, इसका सबूत हैं. पश्चिम इस विषय में असफल रहा है."
चीन अक्सर शिनजियांग पर कोई सार्वजनिक राय नहीं देता. साथ ही शिनजियांग में बाहरी लोगों और मीडिया के प्रवेश की पूरी तरह से नियंत्रित करता है.
दुनिया भर में वीगर समुदाय के प्रति चीनी रवैया की आलोचना बढ़ती जा रही है. लेकिन अब तक किसी भी मुल्क़ ने आलोचना भरे शब्दों से आगे कोई क़दम नहीं उठाया है.
अमरीका में कांग्रेस की चीनी मामलों की कमेटी ने ट्रंप प्रशासन से शिनजियांग में मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़ी कंपनियों और अधिकारियों पर पाबंदी लगाने की गुहार की है.
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है - "अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को हिरासत में रखा जा रहा है. उनका टॉर्चर हो रहा है. उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं पर पाबंदी लगी हुई है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हर पहलू निगरानी में है."
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठन की नई प्रमुख मिशेल बेशलेट ने भी शिनजियांग में पर्यवेक्षकों को शिनजियांग में जाने देने की अनुमति मांगी है. चीन ने इस मांग को सिरे से ख़ारिज करते हुए ग़ुस्से का इज़हार किया है.